कोई आहट न कोई डगर सामने

कोई आहट न कोई डगर सामने ।
एक अक्स-ए-सफ़र सरबसर सामने ।

आसमाँ पर लहू गुल बिखरता हुआ
और उभरता हुआ मेरा सर सामने ।

वो अकेला हज़ारों से लड़ता रहा
जंग होती रहे रात भर सामने ।

नन्हीं मुन्नी दुआओं का हासिल है क्या
लुट गया सारा रख़्त-ए-सफ़र सामने ।

टूट कर सारे मंज़र बिखरने लगे
बेतहाशा उड़े बाम-ओ-दर सामने ।

यक-ब-यक सारा जंगल सिमटने लगा
हुए ज़ेर-ए-ज़मीं सब शजर सामने ।

कश्तियाँ टूट कर सब किनारे लगीं
कैसे आसेब का है सफ़र सामने ।

कोई अवतार तो इस ज़मीं पर मिले
आए कोई तो पैग़ाम्बर सामाने ।

फ़ासला मेरे पैरों में मंज़िल का है
वर्ना रहता कहाँ ये सफ़र सामने ।

उससे बिछड़े हुए एक मुद्दत हुई
फिर भी रहता है वो सरबसर सामने ।

टुकड़े-टुकड़े बदन, रक़्स करता हुआ
इक ज़रा सा उधर, बाम पर, सामने ।

इक झलक सब्ज़ मिट्टी की आँखों में बस
शोला-शोला शफ़क़, लम्हा भर सामने ।

सर पे बूढ़ा गगन कब से रखा हुआ
रक़्स-ए-शम्स-ओ-क़मर आँख भर सामने ।

कोई मुझमें मुझे क़ैद करता हुआ
फेंक कर ये लाल-ओ-गोहर सामने ।

क्या करूँ मेरा मन था ख़लाओं में गुम
वो दिखाता रहा सब हुनर सामने ।

सीना-सीना सफर, ये तिलिस्म-ए-हुनर
देख ‘अजमल’ है रफ़्तार भर सामने ।

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