आ मेरि जान कभी प्यार की पहचान में आ

आ मेरि जान कभी प्यार की पहचान में आ ।
तू अगर शोला है तो दीदा-ए-हैरान में आ ।

मुस्कुराता हुआ तू चाँद सितारों से निकल
और हँसता हुआ भूले से कभी जान में आ ।

तश्नगी ठहरी बुझाना तो बयाबाँ पे बरसा
गोद में माँ की उतर, धरती के पिस्तान में आ ।

दश्त-ए-वहशत से मेरि इस क़दर आसाँ न गुज़र
छोड़ आँखों को मेरि, दस्त-ओ-गिरेबान में आ ।

क़तरा-क़तरा मेरि आँखों से मेरे दिल में उतर
रफ़्ता-रफ़्ता मेरे सीने से मेरि जान मॆं आ ।

शोरिश-ए-जाँ से मेरि ऐसे न कतरा के गुज़र
मेरी साँसों का मज़ा ले, मेरे हैजान में आ ।

बर्ग-ए-आवारा पे ही लिख दे हिकायत अपनी
आ मेरि जान कभी हर्फ़-ए-परेशान में आ ।

देख ले अपनी ख़ुदाई का तमाशा ख़ुद ही
आस्माँ वाले कभी पैकर-ए-इंसान में आ ।

Leave a Reply