संसार उस के साथ है जिस को समय की फ़िक्र है

सदियों पुरानी सभ्यता को बीस बार टटोलिए|
किसको मिली बैठे बिठाये क़ामयाबी बोलिए|
है वक़्त का यह ही तक़ाज़ा ध्यान से सुन लीजिए|
मंज़िल खड़ी है सामने ही, हौसला तो कीजिए||

चींटी कभी आराम करती आपने देखी कहीं|
कोशिश ज़दा रहती हमेशा, हारती मकड़ी नहीं|
सामान्य दिन का मामला हो, या कि फिर हो आपदा|
जलचर, गगनचर कर्म कर के, पेट भरते हैं सदा||

गुरुग्रंथ, गीता, बाइबिल, क़ुरआन, रामायण पढ़ी|
प्रारब्ध सबको मान्य है, पर – कर्म की महिमा बड़ी|
ऋगवेद की अनुपम ऋचाओं में इसी का ज़िक्र है|
संसार उस के साथ है जिस को समय की फ़िक्र है||

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