३८७३. गुमसुम सी बैठी कोने में नार अकेली सोच रही है

३८७३. गुमसुम सी बैठी कोने में नार अकेली सोच रही है

 

गुमसुम सी बैठी कोने में नार अकेली सोच रही है

कारण क्या है नारी ने सदियों से केवल मार सही है

 

देख रही है मिली बहुत है मर्दों को आज़ादी रब से

सोच रही है मन में क्या उसका भी इक भगवान वही है

 

करे गुलामी पहले भाई और पिता की फिर शौहर की

जब से जन्म लिया है उसने ये ही सबने बात कही है

 

सबने केवल रूप निहारा लब की मुस्कानें भी देखीं

किसने देखा है नयनों से धारा इक चुपचाप बही है

 

रह गई है महफ़िल में मानो ख़लिश खिलौना बनके नर की

एक पुरुष ने चीर हरा दूजे ने आ कर बाँह गही है.

 

महेश चन्द्र गुप्तख़लिश

९ अप्रेल २०१२

 

Leave a Reply