चल चलें इक राह नूतन

चल चलें इक राह नूतन

भय न किंचित हो जहाँ पर
पल्लवित सुख हो निरंतर
अब लगाएं हम वहीँ पर
बन्धु – निज आसन

द्वेष – ईर्ष्या को न प्रश्रय
दुर्गुणों की हो पराजय
हो जहाँ बस प्रेम की जय
खिल उठे तन मन

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