आदमीयत की वक़ालत कर रहा है आदमी

आदमीयत की वक़ालत कर रहा है आदमी|
यूँ उज़ालों की हिफ़ाज़त कर रहा है आदमी

सिर्फ ये पूछा – भला क्या अर्थ है अधिकार का
वो समझ बैठे, बग़ावत कर रहा है आदमी

छीन कर कुर्सी, अदालत में घसीटा है फ़क़त|
चोट खा कर भी, शराफ़त कर रहा है आदमी

आँखें मूंदे टेक्स भरता जा रहा है बेहिसाब
अनपढ़ों के जैसी हरक़त कर रहा है आदमी

जब ये चाहेगा बदल देगा ज़माने का मिजाज़
सिर्फ क़ानूनों की इज्ज़त कर रहा है आदमी

सल्तनत के तख़्त के नीचे है लाशों की परत
कैसे हम कह दें, हुक़ूमत कर रहा है आदमी

मुद्दतों से शह्र की ख़ामोशियाँ यह कह रहीं
आज कल भेड़ों की सुहबत कर रहा है आदमी

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