आभार-स्वीकार

‘दर्द’ तुमने कहा जिसको
और यों दुखती हुई रग जान ली
मैंने अभी तक सहा जिसको ।

उसीको-

हाँ, छिपाने के लिये उसको
गीत गाये थे,
अधूरे और पूरे गीत गाये थे ।

जान ही जब लिया तुमने
शेष और भला बचा क्या ।
दर्द के अतिरिक्त हमने
सहा याकि रचा भला क्या ।

कहीं कुछ भी नहीं :
केवल प्यास, केवल आग ।
धब्बे, चिन्ह, बेबस दाग

यही थे-
जिनको बहाने के लिये आँसू छिपाये थे ।

तुम्हींने यह भी कहा था-

‘मिटाने पर मिट न जाये
दर्द यह ऐसा नहीं है ।
शर्त लेकिन एक है-
उस दर्द में मत रमो ।
देखो।
पाल खोलो, उठाओ लंगर,
चलो-
दुखती हुई रग के सदृश यह द्वीप त्यागो ।‘

तुम्हींने हमसे कहा था-

‘अरे, जागो ।‘

और उस कहने तथा
खुद भी बहुत सहने के कारन
मुक्ति की जब घड़ी आई-

स्वत: बन्दी बना था जिस द्वीप में
उससे विलग हो, पाल खोले
मुक्त नाविक ने
उधर … उस द्वीप को जाती लहर पर

पुष्प अंजलि से बहाये थे ।

आज वह सब व्यक्त है
जिसको छिपाने के लिये …
छिपा देने के लिये कुल गीत गाये थे ।
आज सचमुच मुक्त है
जिसको बहाने के लिये …
बहा देने के लिये आँसू छिपाये थे ।
आज तो वह त्यक्त है
वह दर्द भी : वह द्वीप भी …
वही जिस तक पुष्प अंजलि से बहाये थे ।

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