मन फिर आज उदास हुआ है

मन फिर आज उदास हुआ है !
राम को फिर बनवास हुआ है !!

असुर नित पुरुष्कृत हो रहे !
सत का फिर उपहास हुआ है !!

लब-कुश कचरा बेच रहे हैं !
भ्रष्टो का जग दास हुआ है !!

घर मै बैठा रोये “फ़कीर” !
प्रलय का आभाष हुआ है !!

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