न समझे कोई कि पिए बैठा हूँ

न समझे कोई कि पिए बैठा हूँ !
तकाजा-ए-उम्र लिए बैठा हूँ !!
फक्र मेरी होश-ओ-हवासी पर !
कबसे होठों को सिए बैठा हूँ  !!

वो याद का मौसम तो अब भी है !
जो कब का रुसवा किए  बैठा हूँ  !!

न कर शिकवा हमदम में तेरा हूँ !
उन यादों को ही  जिए बैठा हूँ !!

ये हंगामा मिरी  बुतपरस्ती पर !
मैं फकत  मुसलमा हुए बैठा हूँ !!

……………….प्रदीप अवस्थी , “शिवपुरी

Leave a Reply