अली अकबर खाँ

सरोद पर तुमने था बजाया,

मैं समझा नहीं। मैंने देखा,

पीतल और लोहे से

तुमने मधु निचोड़ा :

सारा कड़वापन दूर हो गया,

मधु विदुंत होकर बँट गया।

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