केवल हिम

हिम, केवल हिम-
अपने शिवःरूप में
हिम ही हिम अब!
रग-गंध सब पिरत्याग कर
भोजपत्रवत हिमाच्छादित
वनस्पित से हीन
धरित्री-
स्वयं तपस्या।
पता नहीं
किस इतिहास-प्रतीक्षा में
यहाँ शताब्िदयाँ भी लेटी हैं
हिम थुल़्मों में।
शिवा की गौर-प्रलम्ब भुजाआें सी
पवर्त-मालाएँ
नभ के नील पटल पर
पृथिवी-सूक्त लिख रहीं।
नीलमवणीर् नभ के
इस बर्ह्माण्ड-सिन्धु में
हिम का राशिभूत
यह ज्वार
शिखर, प्रतिशखर
गगनाकुल।

याक सरीखे
धमर्वृषभ इस हिम प्रदेश में

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