माया

दिखाती पहले धूप रूप की ,
दिखाती फ़िर मट मैली काया !
दुहरी झलक दिखा कर अपनी
मोह – मुक्त कर देती माया !

असम्भाव्य भावी की आशा ,
पूर्ति चरम शाश्वत आपूर्ति की ,
ललक कलक में झलक दिखाती
अनासक्त आसक्ति मूर्ति की !
अंत सत्य को सुगम बना तू
हरी की अगम अछूती छाया !

मन में हरी , रसना पर षड-रस ,
अधर धरे मुस्कान सुहानी !
हरी तक उसे नचाती लाती
हरी की जिसने बात न मानी !
शकुन दिखा कर अंध तनय को ,
हरी-माया ने खेल दिखाया  !

संग्न्याहत हो या अनात्मारत
आत्म मुग्ध या आत्म प्रपंचक ,
पहुँचाया है हर झूठे को ,
माया ने झूठे के घर तक  !
लगन लगा कर , मोह मगन को ,
मृग लाल , जल निधि पार कराया  !

अंहकार को निराधार कर ,
निरंकार के सम्मुख लाती  !
गिरिजापति का मान बढ़ाने
रति के पति को भस्म कराती  !
नेह लगाया यदि माया से ,
निज को खो , हरी – हर को पाया  !

अपनी समझ लिए हर कोई ,
करता रहता तेरी – मेरी  !
वोह अनेक जन मन विलासिनी
एक मात्र श्री हरी की चेरी  !
मैंने इस सहस्ररूपा को ,
राममयी कह शीश झुकाया  !

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