कवियों का विद्रो

‘चांदनी चंदन सदृश’ :

हम क्यों लिखें ?

मुख हमें कमलों-सरीखे

क्यों दिखें ?
हम लिखेंगे :

चांदनी उस रूपए-सी है
कि जिसमें
चमक है, पर खनक ग़ायब है ।

हम कहेंगे ज़ोर से :
मुँह घर-अजायब है…
(जहाँ पर बेतुके, अनमोल, ज़िन्दा और मुर्दा भाव रहते हैं ।)

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