बेपरदा

जब भी आता है, पतझर
बेपरदा कर देता है
घोसलों को,
टहनियों और ’फुनगियों’ को
चेचक सी निकल आती है,
परिन्दों को
अपना ही ’खोन्था’
कँटीला नज़र आता है ….
और पत्तियाँ
खाद बनकर सार्थक हो लेती हैं
बसंत आता है
(बस – अन्त आता है)
कोपलें छितरा उठती हैं
….. घोसले और भी सुरक्षित
मगन हो
चहचहा उठते हैं.
और पत्तियाँ?
ताली बजा कर
स्वागत करती हैं.
और आदमी है
कुल्हाड़ी पर ’सान’ धरता
इस आदमी को भी –
बेपरदा करो भाई
पतझर तो बेपरदा कर देता है
घोसलों को.

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