कुछ क़तआत

कहाँ तक रास्ता देखा करें हम बर्के़-खिरमन का।

लगाकर आग देखेंगे तमाशा अब नशेमन का॥

अदाये-सादगी में कंघी-चोटी ने ख़लल डाला।

शिकन माथे पे, अबरू में गिरह, गेसू में बल डाला॥

आ गया फिर रंमज़ाँ, क्या होगा।

हाय ऐ पीरेमुग़ाँ! क्या होगा॥

अहसान ले न हिम्मते-मर्दाना छोड़कर।

रस्ता भी चल तो सब्ज़ये-बेगाना छोड़कर॥

Leave a Reply