बालपन-बाँसुरी बजैया का

यारो सुनो ! ये दधि के लुटैया का बालपन ।
और मधुपुरी नगर के बसैया का बालपन ।।
मोहन-सरूप निरत करैया का बालपन ।
बन-बन के ग्‍वाल गौएँ चरैया का बालपन ।।

ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन ।
क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन ।।1।। 

ज़ाहिर में सुत वो नंद जसोदा के आप थे ।
वरना वह आप माई थे और आप बाप थे ।।
परदे में बालपन के यह उनके मिलाप थे ।
जोती सरूप कहिए जिन्‍हें सो वह आप थे ।।

ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन । 
क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन ।।2।। 

उनको तो बालपन से न था काम कुछ ज़रा ।
संसार की जो रीति थी उसको रखा बचा ।।
मालिक थे वो तो आपी उन्‍हें बालपन से क्‍या ।
वाँ बालपन, जवानी, बुढ़ापा, सब एक सा ।।

ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन । 
क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन ।।3।। 

मालिक जो होवे उसको सभी ठाठ याँ सरे ।
चाहे वह नंगे पाँव फिरे या मुकुट धरे ।।
सब रूप हैं उसी के वह जो चाहे सो करे ।
चाहे जवाँ हो, चाहे लड़कपन से मन हरे ।।

ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन । 
क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन ।।4।। 

बाले हो ब्रज राज जो दुनियाँ में आ गए ।
लीला के लाख रंग तमाशे दिखा गए ।।
इस बालपन के रूप में कितनों को भा गए ।
इक यह भी लहर थी कि जहाँ को जता गए ।।

ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन । 
क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन ।।5।। 

यूँ बालपन तो होता है हर तिफ़्ल का भला ।
पर उनके बालपन में तो कुछ और भेद था ।।
इस भेद की भला जी, किसी को ख़बर है क्या ।
क्या जाने अपने खेलने आए थे क्या कला ।।

ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन । 
क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन ।।6।।

राधारमन तो यारो अजब जायेगौर थे ।
लड़कों में वह कहाँ है, जो कुछ उनमें तौर थे ।।
आप ही वह प्रभू नाथ थे आप ही वह दौर थे ।
उनके तो बालपन ही में तेवर कुछ और थे ।।

ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन । 
क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन ।।7।।

वह बालपन में देखते जिधर नज़र उठा ।
पत्थर भी एक बार तो बन जाता मोम सा ।।
उस रूप को ज्ञानी कोई देखता जो आ ।
दंडवत ही वह करता था माथा झुका झुका ।।

ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन । 
क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन ।।8।। 

परदा न बालपन का वह करते अगर ज़रा ।
क्‍या ताब थी जो कोई नज़र भर के देखता ।।
झाड़ और पहाड़ देते सभी अपना सर झुका ।
पर कौन जानता था जो कुछ उनका भेद था ।।

ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन । 
क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन ।।9।। 

मोहन, मदन, गोपाल, हरी, बंस, मन हरन ।
बलिहारी उनके नाम पै मेरा यह तन बदन ।।
गिरधारी, नंदलाल, हरि नाथ, गोवरधन ।
लाखों किए बनाव, हज़ारों किए जतन ।।

ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन । 
क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन ।।10।।

पैदा तो मधु पुरी में हुए श्याम जी मुरार ।
गोकुल में आके नन्द के घर में लिया क़रार ।।
नन्द उनको देख होवे था जी जान से निसार ।
माई जसोदा पीती थी पानी को वार वार ।।

ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन । 
क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन ।।11।।

जब तक कि दूध पीते रहे ग्वाल ब्रज राज ।
सबके गले के कठुले थे और सबके सर के ताज ।।
सुन्दर जो नारियाँ थीं वे करती थीं कामो-काज ।
रसिया का उन दिनों तो अजब रस का था मिज़ाज ।।

ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन । 
क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन ।।12।।

बदशक्ल से तो रोके सदा दूर हटते थे ।
और ख़ूबरू को देखके हँस-हँस चिमटते थे ।।
जिन नारियों से उनके ग़मो-दर्द बँटते थे ।
उनके तो दौड़-दौड़ गले से लिपटते थे ।।

ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन । 
क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन ।।13।।

अब घुटनियों का उनके मैं चलना बयाँ करूँ ।
या मीठी बातें मुँह से निकलना बयाँ करूँ ।।
या बालकों में इस तरह से पलना बयाँ करूँ ।
या गोदियों में उनका मचलना बयाँ करूँ ।।

ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन । 
क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन ।।14।। 

पाटी पकड़ के चलने लगे जब मदन गोपाल ।
धरती तमाम हो गई एक आन में निहाल ।।
बासुक चरन छूने को चले छोड़ कर पताल ।
अकास पर भी धूम मची देख उनकी चाल ।।

ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन । 
क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन ।।15।।

थी उनकी चाल की जो अ़जब, यारो चाल-ढाल ।
पाँवों में घुंघरू बाजते, सर पर झंडूले बाल ।।
चलते ठुमक-ठुमक के जो वह डगमगाती चाल ।
थांबे कभी जसोदा कभी नन्द लें संभाल ।।

ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन । 
क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन ।।16।।

पहने झगा गले में जो वह दखिनी चीर का ।
गहने में भर रहा गोया लड़का अमीर का ।।
जाता था होश देख के शाही वज़ीर का ।
मैं किस तरह कहूँ इसे चॊरा अहीर का ।।

ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन । 
क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन ।।17।। 

जब पाँवों चलने लागे बिहारी न किशोर ।
माखन उचक्के ठहरे, मलाई दही के चोर ।।
मुँह हाथ दूध से भरे कपड़े भी शोर-बोर ।
डाला तमाम ब्रज की गलियों में अपना शोर ।।

ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन । 
क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन ।।18।।

करने लगे यह धूम, जो गिरधारी नन्द लाल ।
इक आप और दूसरे साथ उनके ग्वाल बाल ।।
माखन दही चुराने लगे सबके देख भाल ।
की अपनी दधि की चोरी घर घर में धूम डाल ।।

ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन । 
क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन ।।19।।

थे घर जो ग्वालिनों के लगे घर से जा-बजा ।
जिस घर को ख़ाली देखा उसी घर में जा फिरा ।।
माखन मलाई, दूध, जो पाया सो खा लिया ।
कुछ खाया, कुछ ख़राब किया, कुछ गिरा दिया ।।

ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन । 
क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन ।।20।। 

कोठी में होवे फिर तो उसी को ढंढोरना ।
गोली में हो तो उसमें भी जा मुँह को बोरना ।।
ऊँचा हो तो भी कांधे पै चढ़ कर न छोड़ना ।
पहुँचा न हाथ तो उसे मुरली से फोड़ना ।।

ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन । 
क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन ।।21।।

गर चोरी करते आ गई ग्वालिन कोई वहाँ ।
और उसने आ पकड़ लिया तो उससे बोले हाँ ।।
मैं तो तेरे दही की उड़ाता था मक्खियाँ ।
खाता नहीं मैं उसकी निकाले था चूँटियाँ ।।

ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन । 
क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन ।।22।।

गर मारने को हाथ उठाती कोई ज़रा ।
तो उसकी अंगिया फाड़ते घूसे लगा-लगा ।।
चिल्लाते गाली देते, मचल जाते जा बजा ।
हर तरह वाँ से भाग निकलते उड़ा छुड़ा ।।

ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन । 
क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन ।।23।।

ग़ुस्से में कोई हाथ पकड़ती जो आन कर ।
तो उसको वह सरूप दिखाते थे मुरलीधर ।।
जो आपी लाके धरती वह माखन कटोरी भर ।
ग़ुस्सा वह उनका आन में जाता वहीं उतर ।।

ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन । 
क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन ।।24।।

उनको तो देख ग्वालिनें जी जान पाती थीं ।
घर में इसी बहाने से उनको बुलाती थीं ।।
ज़ाहिर में उनके हाथ से वह ग़ुल मचाती थीं ।
पर्दे में सब वह किशन के बलिहारी जाती थीं ।।

ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन । 
क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन ।।25।। 

कहतीं थीं दिल में दूध जो अब हम छिपाएँगे ।
श्रीकिशन इसी बहाने हमें मुँह दिखाएँगे ।।
और जो हमारे घर में यह माखन न पाएँगे ।
तो उनको क्या गरज़ है यह काहे को आएँगे ।।

ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन । 
क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन ।।26।।

सब मिल जसोदा पास यह कहती थी आके बीर ।
अब तो तुम्हारा कान्ह हुआ है बड़ा शरीर ।।
देता है हमको गालियाँ फिर फाड़ता है चीर ।
छोड़े दही न दूध, न माखन, मही न खीर ।।

ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन । 
क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन ।।27।।

माता जसोदा उनकी बहुत करती मिनतियाँ ।
और कान्ह को डराती उठा बन की साँटियाँ ।।
जब कान्हा जी जसोदा से करते यही बयाँ ।
तुम सच न जानो माता, यह सारी हैं झूटियाँ ।।

ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन । 
क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन ।।28।।

माता कभी यह मेरी छुंगलियाँ छुपाती हैं ।
जाता हूँ राह में तो मुझे छेड़ जाती हैं ।।
आप ही मुझे रुठातीं हैं आपी मनाती हैं ।
मारो इन्हें ये मुझको बहुत सा सताती हैं ।।

ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन । 
क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन ।।29।।

माता कभी यह मुझको पकड़ कर ले जाती हैं ।
गाने में अपने साथ मुझे भी गवाती हैं ।।
सब नाचती हैं आप मुझे भी नचाती हैं ।
आप ही तुम्हारे पास यह फ़रयादी आती हैं ।।

ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन । 
क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन ।।30।। 

एक रोज़ मुँह में कान्ह ने माखन झुका दिया ।
पूछा जसोदा ने तो वहीं मुँह बना दिया ।।
मुँह खोल तीन लोक का आलम दिखा दिया ।
एक आन में दिखा दिया और फिर भुला दिया ।

ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन । 
क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन ।।31।।

थे कान्ह जी तो नंद जसोदा के घर के माह ।
मोहन नवल किशोर की थी सबके दिल में चाह ।।
उनको जो देखता था सो कहता था वाह-वाह ।
ऐसा तो बालपन न हुआ है किसी का आह ।।

ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन । 
क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन ।।32।।

सब मिलकर यारो किशन मुरारी की बोलो जै ।
गोबिन्द छैल कुंज बिहारी की बोलो जै ।।
दधिचोर गोपी नाथ, बिहारी की बोलो जै ।
तुम भी ‘नज़ीर’ किशन बिहारी की बोलो जै ।।

ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन । 
क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन ।।33।।

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