शाम

टूट गिरा पत्ते-सा दिन
धुआँ पहनने लगीं दिशाएँ

दीवालों के दाएं-बाएं

किरणों की नाजुक टहनी पर

झूल रहा छत्ते-सा दिन
गीली चिड़िया की पाँखों से

चूने लगा समय आँखों से

सूख रहा छत की मुँडेर पर

यह कपड़े-लत्ते-सा दिन
नाखूनों से तेज़ हवा के

मुँह पर कई खरोंच लगा के

कालचक्र पर मढ़ी जिल्द से

उघर रहा गत्ते-सा दिन

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