आठ औरतें

जिनमें से एक ने प्रेम किया मुझसे
ज्यों बूंदों ने धरती से ,
दूसरी ने घृणा जतलाई
जैसे बलिपशु ने बधिक से :

अंन्तरम से उदभूत भावनाएँ।

तीसरी ने मन दिया मुझे
जैसे सुरभि ने पवन को,
चौथी ने तन देना चाहा
उर्वशी ने अर्जुन को ज्यों :

भक्ति-आसक्ति के परस्पर विरोधी अनुभव।

पाँचवीं ने मुझ पर सर्वस्व वार दिया
ज्यों शेफ़ाली करती समर्पण हर सुबह,
और छठी ने मेरा सर्वस्व लेना चाहा
वामन ने बलि का जैसे :

मानव-विकारों के अदभुत उदाहरण्।

सातवीं उमड़ी मुझ तक
चांद के प्रति लहरों के आवेग की भाँति,
आठवीं हटी मुझसे
पाप जैसे मन्दिर से :

जीवन के ‘पल-पल परिवर्तित’ व्यवहार।

बदला मैं,
जुड़ा और टूटा भी,
मिला और छूटा भी,
उठा और गिरा,
कभी मुक्त, कभी घिरा रहा
उन सबके कारण ।

और वे सबकी सब-
आठों, दसों या बीसों :
केवल एक ‘तुम’ थीं ।

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