मौन न अपने से टूटेगा

दिन कैसे बदलेंगे
हवा नहीं बदली तो

खिड़की, रोशनदान खुले
पर, घनी उमस है
बदहवास मन में
बेचैनी गयी अड़स है
खुशबू नहीं मिलेगी
अगर न खिली कली तो
आसमान का मौन
न अपने से टूटेगा
नमी बिना क्यों अंकुर
बीहन में फूटेगा
वर्षा होगी
अगर घिरी काली बदली तो

बिना कंठ खोले ही
क्या विरहा ठनकेगा
बिना कठिन संघर्ष
न यह मौसम बदलेगा
सूत कतेंगे
अगर मिले रुई
तकली तो।

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