गिरे ताड़ से

गिरे ताड़ से
मगर बीच में ही
खजूर पर हम अँटके।

घर की झोल लगी दीवारों पर हैं
चमगादड़ लटके
खूस गए हैं काठ
धरन, ओलती, दरवाज़े,चौखट के

और न जीवित रहे
याद में गीत
पनघट के।

साँप सूंघ जाने के कारण हम लगते
माहुर-माते
उखड़ रही साँसों से
कैसे आँखों की उलटन जातें

नागफनी के जंगल में
उम्मीदों के
बादुर भटके।

पूरी नींद न हम सो पाते
अब तक
मिले दिलासे से
जब तक सोने बदले
गए यहाँ हैं पीतल-काँसे से

पानी कहाँ रखे हम
पेंदी तक हैं
चिसक गए मटके।

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