धुँधले प्रतिबिम्ब

धुँधले प्रतिबिम्ब और काँपती लकीर ।

पीले पन्नों को जो मोड़ रहे
भीड़ को
अकेले में छोड़ रहे
धारा से कटे हुए उम्र के फ़क़ीर ।

तीन पात ढाक के लगाए हैं
जागे तो, प्रेत ही जगाए हैं –
पगड़ी से
झाँक रहे हरण किए चीर ।

नई फ़सल कौड़ी के लेखे में
गाड़ रहे अब भी
उखड़े खेमे
सीने से चिपकाए टूटी तस्वीर ।

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