छोड़ो-छोड़ो चरचे अब ये बहुत पुराने

छोड़ो छोड़ो चरचे अब ये बहुत पुराने।
कब तक इनमें हम रस, रूप, सुगंध तलाशें?
जीवित हैं कुछ शब्द और कुछ केवल लाशें।
लोगों को लगता है आए नए ज़माने-

अगर यहीं से। बदतर हुआ निज़ाम भला क्यों?
कोई नहीं प्रस्तुत है जन जो मुझे बता दे,
सही मुकामों का जो मुझे सही पता दे।
अप्रस्तुत इनके रहीम तो हैं उनके भी रामलला क्यों?

हम सीधे पर पीछे लगी उल्टी बला है-
आजिज़ आए हैं हम सब ही इस मौसम से,
मुक्ति नहीं है दो कौड़ी के बंधुआ श्रम से।
अपनों ने ही अपने को हर बार छला है।

प्रश्न चिन्ह ही प्रश्न चिन्ह क्यों खड़े हुए हैं?
इनकी भीड़-भाड़ में हम सब बड़े हुए हैं।

Leave a Reply