चाहना जागी लगे खाँचा बनाने

चाहना जागी लगे खाँचा बनाने-
समय श्रम। दोनों लगे साँचा बनाने।

चाहता हूँ ढालना अनुभूतियों को
और प्राणों में बसे कुछ मोतियों को।
रूप, रंग, आकार की क्यों फ़िक्र पालूँ
चाहते हैं लोग असली ज्योतियों को।

सागरोमीना रहें गर सामने तो,
हम बहुत हैं। होश अपने थामने को-
मीरो ग़ालिब, निरालाओं से कहूँ क्या?
ज़माना आगे पड़ा है साधने को।

आज भाषा को मिला है समय गढ़ने,
चले हैं अक्षर हमें ये आज पढ़ने।
हम उन्हें वो बाँचने में लगे हमको-
प्रयासों से सीढ़ियाँ हम आज चढ़ने।

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