स्वै गई निशँक आज ये री परयँक पर

स्वै गई निशँक आज ये री परयँक पर ,
बँग भौँह वारो मोहिँ अँक मो लगा गयो ।
मुरली मुकुट कटि तट पीतपट तैसे ,
अटपटी चाल चित मेरो उरझा गयो ।
कहै नन्दराम मुरि मन्द मुसकाय ,
नेक समझि न पायो कछु कान मेँ सुना गयो ।
आ गयो अचानक देखा गयो मयँक मुख ,
हाँ गयो कितै कि मोहिँ सोवत जगा गयो ।

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