बीज की तरह

एक बरती हुई दिनचर्या अब
छूट गई है आँख से बाहर
उतर रही है धीरे-धीरे
आसमान से गर्द
दूर तक दिखने लगा है
रेत का विस्तार
उड़ान की तैयारी से पूर्व
पंछी जैसे दरख़्तों की डाल पर !
जानता हूँ, ज्वार उतरने के साथ
यहीं किनारे पर
छूट जाएँगी कश्तियाँ
शंख-घोंघे-सीपियों के खोल
अवशेषों में अब कहाँ जीवन ?
जीवनदायी हवाएँ बहती हैं
आदिम बस्तियों के बीच
उन्हीं के सहवास में रचने का
अपना सुख
निरापद हरियाली की छाँव में !
इससे पहले कि अँधेरा आकर
ढँक ले फलक तक फैले
दीठ का विस्तार,
मुझे पानी और मिट्टी के बीच
एक बीज की तरह
बने रहना है पृथ्वी की कोख में !

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