सूर आयौ माथे पर, छाया आई पाँइन तर

तर ढरे पथिक डगर देखि छाँह गहरी ।
सोए सुकुमार लोग जोरि कै किंवार द्वार,
पवन सीतल घोख मोख भवन भरत गहरी ॥
धंधी जन धंध छाँड़ि, जब तपत धूप डरन,
पसु-पंछी जीव-जंतु छिपत तरुन सहरी ।
नंददास प्रभु ऐसे में गवन न कीजै कहुँ,
माह की आधी रात जैसी ये जेठ की दुपहरी ॥

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