प्रेमी के बारे में

हवा से मैंने प्रेम के बारे में पूछा
वह उदास वृझों के पास चली गई

सूरज से पूछा
वह निश्चिंत चट्टानों पर सोया रहा

चन्‍द्रमा से मैंने पूछा प्रेम के बारे में
वह इंतज़ार करता रहा
लहरों और लौटती हुई पूर्णिमा का

पृथ्‍वी ही बची थी
प्रेम के बारे में बताने के लिए
जहाँ मृत्‍यु थी और ज़िन्‍दगी

सन्‍नाटा था और संगीत
लड़कियाँ थीं और लड़के
हज़ारों बार वे मिले थे और कभी नहीं

समुद्र था और तैरते हुए जहाज़
एकान्‍त था और सभाएँ
प्रेम के दिन थे अनंत
और एक दिन था

यहाँ एक शहर था सुनसान
और प्रतीक्षा थी
यहाँ जो रह रहे थे कहीं चले गए थे
थके और बोझा ढोते
जो थक गए थे लौट आए थे

यहाँ राख थी और लाल कनेर
प्रेम था और हाहाकार

Leave a Reply