अभिधा में नहीं

जो कुछ कहना हो उसे
—ख़ुद से भी चाहे—
व्यंजना में कहती है वह
कभी लक्षणा में
अभिधा में नहीं लेकिन
कभी

कोई अदालत है प्रेम जैसे
क़बूल अभिधा में जो
कर लिया
—सज़ा से बचेगी कैसे !

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