कविता सुनाई पानी ने-4

कभी देखी हैं सूने स्टेशनों पर

पटरियाँ

जो नहीं ले जातीं
किसी को कहीं
पड़ी रहती हैं केवल वहीं

उजड़ा हुआ डिब्बा कभी कोई
आ खड़ा होता है वहाँ

कुछ वक़्त

कोई हमेशा ही खड़ा रहता है–
आसरा किसी बेघर का

ऎसे ख़राबों की हमनशीं
इन पटरियों-सा
बिछा हूँ मैं यहीं-
कहीं पहुँचाने का वायदा नहीं कोई
नहीं, कोई हमदर्दी नहीं
बसेगा तुम से
मेरा भी उजाड़ यह कहीं ।

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