नाम पर तहज़ीब—ओ—मज़हब के मचा हुड़दंग है

नाम पर तहज़ीब—ओ—मज़हब के मचा हुड़दंग है

आदमी की आदमी से ही छिड़ी अब जंग है
रोज़ हंगामों से अपना शह्र सारा दंग है

और बाचने का यहाँ हर रास्ता भी तंग है
दे रहा है मश्विरे वो घर सजाने के हमें

शख़्स, जिसके अपने घर का रंग ही बदरंग है
ढूँढने होंगे नये कुछ शस्त्र अब जा कर कहीं

सब पुराने आयुधों में लग चुकी अब ज़ंग है
वो क़लम की छ्टपटाहट पर करेंगे टिप्पणी

भावना से हैं अपिरिचित, सोच को अरधंग है
‘द्विज’! कहो ग़ज़लें सुहानी, गीत गाओ धूप के

रात की काली सियाही का भयानक रंग है

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