जब भी अपने आपसे ग़द्दार हो जाते हैं लोग

जब भी अपने आपसे ग़द्दार हो जाते हैं लोग

ज़िन्दगी के नाम पर धिक्कार हो जाते हैं लोग
सत्य और ईमान के हिस्से में हैं गुमनामियाँ

साज़िशें बुन कर मगर अवतार हो जाते हैं लोग
बेच देते हैं सरे—बाज़ार वो जिस्मो—ज़मीर

भूख से जब भी कभी लाचार हो जाते हैं लोग
रात भर मशगूल रहते हैं अँधेरों में कहीं

और अगली सुबह का अखबार हो जाते हैं लोग
फिर कबीलों का न जाने हश्र क्या होगा, जहाँ

नोंक पर बंदूक की सरदार हो जाते हैं लोग
मतलबों की भीड़ जब—जब कुलबुलाती है यहाँ

हमने देखा है बड़े मक़्क़ार हो जाते हैं लोग
साहिलों पर बैठ तन्हा ‘द्विज’ ! भला क्या इन्तज़ार

आज हैं इस पार कल उस पार हो जाते हैं लोग

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