सुर ही के भार, सूधे सबद सुकरीन के

सुर ही के भार, सूधे सबद सुकरीन के,
मंदिर त्यागि करैं, अनत कं न गौन।
द्विजदेव त्यौं ही मधु भारन अपारन सौं,
नैकु झुकि झूमि रहे, मोगरे मरुअ दौन॥

खोलि इन नैननि, निहारौं तौ निहारौं कहा,
सुखमा अभूत, छाइ रही प्रति भौन-भौन।
चांदनी के भारन, दिखात उनयो सो चंद,
गंध ही के भारन, बहत मंद-मंद पौन॥

Leave a Reply