मदमाती रसाल की डारन पै चढ़ि ऊँचे से बोल उचारती हैँ

मदमाती रसाल की डारन पै चढ़ि ऊँचे से बोल उचारती हैँ ।
कुल कानि की कान करै न कछू मन हाथ पराए ही पारती हैँ ।
कोऊ कैसी करै द्विज तूही कहै नहीँ नेकौ दया उर धारती हैँ ।
अरी क्वैलिया कूकि करेजन की किरचैँ किरचैँ किए डारती हैँ ।

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