हमको भी आता है

पर्वत के सीने से,
झरता है झरना
हमको भी आता है, भीड़ से
गुज़रना ।

कुछ पत्थर, कुछ रोड़े
कुछ हंसों के जोड़े
नींदों के घाट लगे
कब दरियाई घोड़े

मैना की पाँखें हैं
बच्चों की आँखें हैं
प्यारी है नींद, मगर शर्त है
उबरना ।

खेतों से, मेड़ों से
साखू के पेड़ों से
कुछ ध्वनियाँ आती हैं
नदी के थपेड़ों से

वर्दी में, सादे में
बाढ़ के इरादे में
आगे-पीछे पानी, देख के
उतरना ।

गूँगी है, बहरी है
काठ की गिलहरी है
आड़ में मदरसे हैं
सामने कचहरी है

बँधे-खुले अँगों से
भर पाया रंगों से
डालों के सेव हैं, सँभाल के
कुतरना ।

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  1. kamlesh sanjida 04/03/2016

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