सन्ध्याएँ

मटमैली गीली संध्याएँ ।

सूरज बुझा बैंगनी, नीला
बीत गया दिन पीला-पीला

हल्के हाथों के तकिए पर
सिर रखकर सो गई हवाएँ ।

टूटे तारों का विज्ञापन
खोया-खोया-सा अपनापन

दूर अँधेरे में घोड़े की
टाप बन गईं नई दिशाएँ ।

इस टीले से उस टीले तक
एक शब्द सिन्दूर मुबारक

सबसे भली नींद की गोली
जब चाहें खाकर सो जाएँ ।

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