उसका जाना

एक दिन बोली वह
अच्छा अब चलती हूँ
और चली गई दूर कहीं

कई दिनों तक नहीं हुई हमारी मुलाकात
शुरू में मैं समझती रही
ऐसे भी कोई जाता होगा भला
लौट आएगी यूँ ही किसी दिन
राह चलते
लौटते हुए घर
धुले हुए कपड़ों की तह लगाते
मिल जाएगी झाँकती देहरी से

भर लेगी बाँहों में
धर देगी आँखों पर कोमल हाथ
और पूछेगी – बताओ कौन?

आह्लादित मैं चहक उठूंगी
कविता!
कहाँ रही तुम इतने दिन?

किंतु जब नहीं लौटी वह
कई महीनों, बरसों तक
मैंने चाहा कई बार
ढूंढ़ा उसे कई जगह

अब मिलती भी है तो पहचानी नहीं जाती
क्या यह तुम ही हो कविता?

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