ये चाह कब है मुझे सब का सब जहान मिले

ये चाह कब है मुझे सब का सब जहान मिले

मुझे तो मेरी ज़मीं मेरा आसमान मिले
कमी नहीं है सजावट की इन मकानों में

सुकून भी तो कभी इनके दरमियान मिले
अजीब वक़्त है सबके लबों पे ताले हैं

नज़र नज़र में मगर अनगिनत बयान मिले
जवां हैं ख़्वाब क़फ़स में भी जिन परिंदों के

मेरी दुआ है उन्हें फिर नई उड़ान मिले
हमारा शहर या ख़्वाबों का कोई मक़्तल है

क़दम क़दम पे लहू के यहाँ निशान मिले
हो जिसमें प्यार की ख़ुशबू मिठास चाहत की

हमारे दौर को ऐसी भी इक ज़ुबान मिले

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