देव जियै जब पूछौ तौ प्रेम को पार कहूँ लहि आवत नाहीँ

देव जियै जब पूछौ तौ प्रेम को पार कहूँ लहि आवत नाहीँ ।
सो सब झूठ मतै मन के बकि मौन सोऊ सहि आवत नाहीँ ।
ह्वै नँद नँद तरँगनि को मन फेन भयो गहि आवत नाहीँ ।
चाहे कह्यो बहुतेरो कछूपै कहा कहिए कहि आवत नाहीँ ।

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