पहाड़-1

अलस्सुबह
सबसे पहले
जाग जाता है

हसरत से देखता है
घाटी से उठता धुँआ
आमदरफ़्त चौपायों की
धीरे-धीरे क्वाली चढ़ते
लकड़हारे के पाँवों को

रपट जाता है
चिल्लारू पर
पगड़ीवाले आदमी का पाँव

झाड़ियों के काँटे
खींचते हैं
सैलानी बाबू की
झकझक कमीज़ को

तब वह
होहोऽऽहोहोऽऽ करके
हँसता है
परिवार के सयाने की तरह।

Leave a Reply