आवारा ढोर

माँ
क्या तुमने सोचा है कभी
उसके बारे में
जिसे तुम बचाती रही हो
हर मौसम की तासीर से
चूमती रही हो देर-सवेर

वह तेरा अक्स
किसी शिद्दत के बाड़े में बन्द
नापता है
कड़कती धूप
प्यास, सहरा
दहकती बर्फ़
वह शरीर के गोशे-गोशे में
समेटे फिर रहा है
अपाहिज़ वक़्त का दस्तावेज़

हर रोज़ सो जाता है
किसी अजनबी ज़मीन पर
छिनाल हवा की चादर ओढ़े

तेरी बूढ़ी टांगें
आँखों से छलकता वात्सल्य
चूमने को थरथराते होंठ
छाती की बुझती गर्मी
अब छू नहीं पाएगी मुझे

फ़ासलों की धुन्ध में अदृश्य
तू सांत्वना देती होगी
अपने आपको यह कहकर
वह कुशल तो होगा ही

मेरे मौन पर
बहुत भीतर से नकारोगी
मेरे न होने की बात
पूछती फिरोगी–
कौन है पुरोहित
कैसा है यह अनुष्ठान
ख़ून पर उगती है नर्म घास
और घास चरते हैं
आवारा ढोर

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