अर्थ है मूल भली तुक डार

अर्थ है मूल भली तुक डार सुखच्छर पत्र को पेखिकै जीजै ।
छन्द है फूल नवोरस हैँ फल दान के वारि सोँ सीँचिबो कीजै ।
दीन कहै योँ प्रवीनन सोँ कवि की कविता रसराखि के पीजै ।
कीरति के बिरवा कवि हैँ इनको कबहूँ कुम्हिलान न दीजै ।

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