तन्हा रहने लगे – डी के निवातिया

तन्हा रहने लगे

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पास होकर भी हम तन्हा-तन्हा रहने लगे,
जब से एक दूजे को हम बेवफ़ा कहने लगे ।

इन्हे नादानियों का नाम दे या गलतफहमियां,
इनमे बेवजह उलझकर दिल पे बोझ सहने लगे ।

बिखर रहे है रिश्ते रफ्ता-रफ्ता, क़तरा-क़तरा,
देख मंज़र तबाही का, आंसू खुद पे बहने लगे ।

जरूरत है हम एक दूसरे की, कोई अहसान नहीं,
क्यों ताश के पत्तो से, विश्वाश अपने ढ़हने लगे ।

इतने भी तो “काफिर” कभी न तुम थे, न हम थे,
अचानक क्यों एक दूजे की नज़रो में गिरने लगे ।

वक़्त का ज़लज़ला है, आया तो टल भी जायेगा,
गर डाल कर हम हाथो में हाथ इससे लड़ने लगे ।

आ चल वापस लौट चले, वक़्त अभी भी बाकी है हमदम,
इससे पहले “धर्म” घरोंदा तन्हाई की आग में दहने लगे !!

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स्वरचित :- डी के निवातिया

6 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 15/04/2019
    • डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 18/04/2019
  2. Bhawana Kumari Bhawana Kumari 15/04/2019
    • डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 18/04/2019
  3. C.M. Sharma C.M. Sharma 16/04/2019
    • डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 18/04/2019

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