ग़ज़ल – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

धरती है तो सबकुछ, वर्ना कौन कहाँ ?
ना जन्म होता ना मृत्यु , उत्थान ना पतन।
तीन लोक – चौदह भुवन सूने पड़ जाते
धरती – आकाश सभी रह जाते मौन यहाँ।

 

मैले – कुचैले अधफटे उनका वसन देखिये
पीठ में पेट पूरा कंकाल का वजन देखिये।

देखिये भूख से व्याकुल उनका बिगड़ता चेहरा
सूख रहा नजरों के सामने इक चमन देखिये।

जुमले बाजों से इन सबको होगा क्या फायदा
देखना है तुमको तो गरीब का जलन देखिये।

गरीबी मिटाने के चक्कर में गरीब मिट रहे
रहनुमा दिखता नहीं राजनीति की चलन देखिये।

इतनी उलझन में भरोसा अब होता कहाँ किसको
गरीबी – सच्चाई ठगी जाती ये प्रचलन देखिये।

जुल्म, अराजकता, का आलम कब तक
रोज – रोज हो रहा इंसानों का हनन देखिये।

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