सलीब- शिशिर मधुकर

जादू तेरी आवाज़ का जिसको नसीब है
दौलत असल उसे मिली वो कैसे गरीब है

क्यों ना जलूँ मैं उसके मुकद्दर को देख के
तेरे हुस्न की मय पी रहा मेरा रकीब है

ना दूर तुझसे हो सके ना तुझको पा सके
ये प्यार अपना देख लो कितना अजीब है

वक्त का ही खेल है ऐसी हवा चली
परेशान है वो शख्स जो थोड़ा नजीब है

दूसरों के दर्द जो खुद पे ले गया
अक्सर उसे मधुकर यहाँ मिलती सलीब है

शिशिर मधुकर

6 Comments

  1. Abhishek Rajhans 04/04/2019
    • Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 04/04/2019
  2. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 04/04/2019
    • Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 04/04/2019
  3. C.M. Sharma C.M. Sharma 06/04/2019
    • Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 06/04/2019

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