दो आँखें

दूर किसी कोने से कुछ देख रही हैं दो आँखें,

जल रहा है हर पेड़-पौधा, बगीचा-बाग़,
घर-घर के आँगन में लगी है आग।

कतरा-कतरा झुलस रही है चेहरों की मुस्कान
तिनका-तिनका टूट रहा है हर मोहल्ला-मकान ।

दूर किसी कोने से कुछ देख रही हैं दो आँखें

हर मोहन सलीम से आँखें फेरता है,
हर रहीम राम से मुँह मोड़ता है।

आज मंदिर की घंटी कुछ कानों में पड़ती नहीं,
आज मस्जिद की अजान पर कुछ आंखें जगती नहीं,

दूर किसी कोने से कुछ देख रही हैं दो आँखें

डाकिये को मिलते हैं अलग से नाम हर चिट्ठी पर,
हैं नफरत, आक्रोश, ईर्ष्या, भय से नाम चिट्ठी पर

अब दिन हैं धूसर से, काली स्याही सी रातें हैं,
इधर-उधर सड़कों पर दौड़ रहे सन्नाटे हैं ।

कुछ गीता सी है, कुछ कुरान सी हैं दो आँखें,
कुछ गीता सी है, कुछ कुरान सी हैं दो आँखें,
दूर किसी कोने से सब देख रही हैं दो आँखें,
दूर किसी कोने से सब देख रही हैं दो आँखें।

11 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 29/03/2019
    • Garima Mishra Garima Mishra 29/03/2019
    • Garima Mishra Garima Mishra 01/04/2019
  2. vijaykr811 vijaykr811 29/03/2019
    • Garima Mishra Garima Mishra 01/04/2019
  3. C.M. Sharma C.M. Sharma 30/03/2019
    • Garima Mishra Garima Mishra 01/04/2019
  4. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 02/04/2019
    • Garima Mishra Garima Mishra 04/04/2019
  5. Nish 02/04/2019
    • Garima Mishra Garima Mishra 04/04/2019

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