उल्फ़त की मय – शिशिर मधुकर

करूँ दूर तुमको कैसे नज़र से
मुश्किल है अब तो बिन तेरे जीना
नशा करने वाले सम्भल जा तू जल्दी
घातक है उल्फ़त की मय रोज पीना

दर्द तुमने अपने दिल में छुपाया
लोगों ने चेहरे पे बस नूर देखा
मगर मैं तो मायूस रहने लगा हूँ
आया ना मुझको जख्मों को सीना

वो नमकीन लम्हें वो रंगीन लम्हें
यादों में अब भी बसर कर रहे हैं
जो देते थे ठंडक कभी मेरे मन को
चैना उन्होंने ही अब मेरा छीना

देखो ज़रा ध्यान से इस जहाँ को
अकेले ना कुछ भी कहीँ हो रहा है
सम्भाला है मैंने बहुत अपने मन को
कटता नही पर मिलन का महीना

क्या बख्शा है तुमको जाने खुदा ने
अब तक ये मधुकर समझ ही ना पाया
नज़र जो गड़ी एक दफा तेरे मुख पे
वो चाहा किए पर फिर भी हटी ना

शिशिर मधुकर

6 Comments

  1. vijaykr811 vijaykr811 28/03/2019
    • Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 29/03/2019
  2. C.M. Sharma C.M. Sharma 29/03/2019
    • Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 29/03/2019
  3. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 02/04/2019
    • Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 02/04/2019

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