दीप एक प्रेम का – शिशिर मधुकर

प्रेम उस से करें कैसे मान जिसने घटाया हो
एक गुणगान गैरों का मेरे आगे सुनाया हो

खड़ा है तन के मेरे सामने वो गैर के जैसा
घमंडी सर कभी चाहत में जो उसने झुकाया हो

मिटेंगे तम सभी मन के ज़रूरत है फ़कत इतनी
दीप एक प्रेम का साथी ने जो हरदम जलाया हो

अलि गुंजेंगे उस बगिया में तुम भी देख लो जग में
जहाँ मालन ने महके फूलों को जमकर खिलाया हो

तन के मिलने से ना मधुकर कोई खूं में समाता है
वही नस नस में बसता है दिल जिसने मिलाया हो

शिशिर मधुकर

4 Comments

  1. vijaykr811 vijaykr811 26/03/2019
    • Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 26/03/2019
  2. C.M. Sharma C.M. Sharma 27/03/2019
    • Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 27/03/2019

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