अब और कुछ नहीं चाहता

अब और कुछ नहीं चाहता
ज़िंदगी की रंगीनियों पर
मातम का गीत चाहता हूँ
क्या हिस्से आया है
सब कुछ भूला कर
कब्र के लिए दो गज जमीन चाहता हूँ
दिख जाते हैं कुछ
मुखौटे लगाए चेहरे सूरज की रौशनी में
बस इसलिए
मैं अंधेरी रात चाहता हूँ
बहुत काट लिया हूँ ज़िन्दगी को
अब इस दर्द से रिहाई चाहता हूँ
गमो के सैलाब में बहुत
हिचकोले खा लिया हूँ
अब किसी किनारे आ कर
ठहर जाना चाहता हूँ
दर्द कब ,क्यों औऱ किसने दिया
क्या हिसाब करूँ अब मैं
आज की रात बस
एक गहरी नींद चाहता हूँ–अभिषेक राजहंस

2 Comments

  1. vijaykr811 vijaykr811 25/03/2019
  2. C.M. Sharma C.M. Sharma 27/03/2019

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