गुनाह- शिशिर मधुकर

अरमान टूटते हैं जब उल्फ़त की राह में
दिल में मिलेगा दर्द एक ऐसी ही चाह में

नज़रों से मैंने आज भी उसको किया दुलार
लेकिन दिखी ना तिश्नगी कोई निगाह में

मायूस हूँ कि फिर से मैं तन्हा ही रह गया
सूझे ना मैं जाऊँ कहाँ किसकी पनाह में

माना सजा से खुद को तुमने बचा लिया
पर साथ में थे तुम मेरे हर इक गुनाह में

मुझको रुलाने वाले को कैसे मिलेगा चैन
बेचैनियों की आग है मधुकर की आह में

शिशिर मधुकर

4 Comments

  1. C.M. Sharma C.M. Sharma 23/03/2019
    • Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 23/03/2019
  2. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 23/03/2019
    • Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 23/03/2019

Leave a Reply