पहले जैसा अब कुछ भी नहीं

पहले जैसा अब कुछ भी नहीं
तुम भी नहीं और मैं भी नहीं
तारों वाली रात तो है
पर तुम्हारे साथ बैठूँ
ऐसी कोई छत ही नहीं
तेरे बिना पैरों के नीचे से खिसकी है जमीं
ना सूरज बचा कोई
ना आसमां है कोई

शायद अब पहले जैसा कुछ भी नहीं
राते गहरी काली अब कटती ही नहीं
मयखाने जा कर भी कोई नशा चढ़ता ही नहीं
अब कोई भी रंग
मेरी ज़िंदगी मे रंग भरता ही नहीं
यादें कचोटती है तुम्हारी
नींदे आँखों मे ठहरती ही नहीं
साँसे तो चल रही अभी भी
पर तुम्हारे बिना मैं ज़िंदा ही नहीं-अभिषेक राजहंस

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  1. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 23/03/2019

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